कर्ज के बोझ से बेहाल एयर इंडिया का बिकना तय, जानें क्‍यों लगातार घाटे में जा रही कंपनी

समस्तीपुर Town कर्ज के बोझ से बेहाल एयर इंडिया का बिकना तय, जानें क्‍यों लगातार घाटे में जा रही कंपनी January 30, 2020

एयर इंडिया लिमिटेड भारत का सबसे बड़ा इंटरनेशनल कैरियर है. वर्तमान में एयर इंडिया के पास 169 एयरक्राफ्ट हैं, जिसमें 19 खराब हो चुके हैं. एयर इंडिया में फिलहाल 20,000 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिसमें लगभग आधे कर्मचारी संविदा पर काम कर रहे हैं.

एयरलाइन के पास कुल 1700 पायलट और 4000 एयर होस्टेस हैं. एयर इंडिया द्वारा रोजाना लगभग 60,000 यात्री विदेश यात्रा करते हैं. हाल ही में एयर इंडिया ने नौ नयी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शुरू की हैं. इसके अलावा देश के कई शहरों को जोड़नेवाली उड़ान सेवा शुरू की है. आपात स्थिति में फंसे लोगों को निकालने में एयर इंडिया की अग्रणी भूमिका होती है.

देश की शीर्ष एयरलाइन एयर इंडिया के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है. कर्ज के बोझ में दबी और कुप्रबंधन की शिकार इस सरकारी एयरलाइन पर वजूद बचाने का संकट आ खड़ा हुआ है. संचालन में घाटा, यात्री भाड़े में गिरावट जैसे कारणों ने कंपनी को डूबने के कगार पर ला खड़ा किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एयर इंडिया का भविष्य किस करवट होगा? मौजूदा संकट का क्या हल है? क्या कंपनी को निजी हाथों में सौंप देने से मौजूदा संकट का समाधान हो जायेगा?

58 हजार करोड़ का कर्ज

आधिकारिक स्रोतों के अनुसार, एयर इंडिया पर वर्तमान में 58,000 करोड़ का कर्ज है, जो लगातार बढ़ रहा है. बढ़ते कर्ज की वजह से बीते कुछ वर्षों के दौरान एयरलाइन घाटे में जा रही है. एक अनुमान के मुताबिक एयर इंडिया को रोजाना 20 से 25 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. इस प्रकार एयर इंडिया को हर महीने 750 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है.

एयर इंडिया को बेचने की तैयारी में सरकार

बढ़ते घाटे के मद्देनजर बीते कुछ समय से भारत सरकार कंपनी को निजी क्षेत्र के हाथों बेचने की तैयारी कर रही है. संसद में भी केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी कह चुके हैं कि सरकार कंपनी के निजीकरण की कोशिशें तेज करेगी. इसके लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया गया है. हालांकि, अभी तक किसी बड़े समूह ने एयरलाइन को खरीदने में रुचि नहीं दिखायी है. वजह स्पष्ट है कि एयरलाइन का 58,000 करोड़ का घाटा. बीते कुछ वर्षों से जारी निजीकरण की कोशिश के बावजूद केंद्र को अभी तक कोई खरीदार नहीं मिला है.

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क्यों लगातार घाटे में जा रही है एयर इंडिया

एयर इंडिया के घाटे में जाने के पीछे कई कारण हैं. हालांकि, किसी एक वजह को केवल दोष नहीं दिया जा सकता. पिछली सरकारों में लिये गये फैसलों की वजह से भी सरकारी एयरलाइन घाटे में चली गयी.

दरअसल, पिछली यूपीए सरकार द्वारा 2006 में देश की दो प्रमुख एयरलाइन कंपनियों एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय का फैसला किया गया था. यहीं से घाटे की शुरुआत हुई, जिससे एयर इंडिया कभी उबर नहीं पायी. इस दौरान कई नये एयरक्राफ्ट खरीदे गये और कई महंगे एयरक्राफ्ट को लीज पर लिया गया, जिससे एयर इंडिया को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. इसके अलावा राजनेताओं और अधिकारियों का रवैया भी कंपनी को घाटे में धकेलने में बड़ी वजह बना. एयर इंडिया पर सरकारी विभागों और मंत्रालयों का 268 करोड़ रुपये का कर्ज होने से कंपनी को बड़ा घाटा उठाना पड़ा है. करोड़ों रुपये के घाटे में जाने के बाद एयर इंडिया ने क्रेडिट पर टिकट देने से मना कर दिया. अपने कर्मचारियों को वेतन आदि के लिए एयर इंडिया को केंद्र सरकार से 500 करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ा.

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कई बदलाव के साथ बिक्री की प्रक्रिया दूसरी बार शुरू

वर्ष 2018 में सरकार ने पहली बार एयर इंडिया को बेचने के लिए बोली लगायी थी, लेकिन कोई खरीदार नहीं मिलने के कारण अंततः इस प्रक्रिया को बंद करना पड़ा था. इसका कारण था एयर इंडिया पर बहुत अधिक ऋण का बोझ और नियंत्रण को लेकर बहुत अधिक दबाव. इतना ही नहीं, तब सरकार इसमें 24 प्रतिशत हिस्सेदारी अपने पास रखना चाहती थी, जिसे बाद में बेचा जाना था. लेकिन इस बार स्थिति अलग है. इसी सोमवार को सरकार ने एयर इंडिया की बिक्री प्रक्रिया को दोबारा प्रारंभ किया और 220 पन्नों का प्रारंभिक सूचना ज्ञापन (पीआईएम) जारी किया. पिछली बार की गलतियों से सीखते हुए इस बार कई चीजें बदली गयी हैं.

इस बदलाव के तहत :

संभावित खरीदारों को 23,286 करोड़ रुपये के कर्ज के साथ एयर इंडिया की शत-प्रतिशत हिस्सेदारी, उसके सभी एयरक्रॉफ्ट, स्लॉट और कर्मचारियों को देने की पेशकश की जा रही है. हालांकि, वीआईपी प्रचालन के लिए इस्तेमाल किये जानेवाले चार बोइंग 747 विमानों को बिक्री प्रक्रिया से अलग रखा जा रहा है.

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एयर इंडिया के साथ उसकी सहायक कंपनी एयर इंडिया एक्सप्रेस भी संभावित खरीदार को बेची जायेगी. इस सहायक कंपनी को एयर इंडिया ने मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया की उड़ानों के लिए शुरू किया था. इसका मुख्यालय कोच्चि में है.

एयर इंडिया सैट्स (एआईएसएटीएस) की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की पेशकश भी इस बार है. एआईएसएटीएस, सिंगापुर एयरलाइंस के साथ संयुक्त उद्यम में हवाई अड्डे का जमीनी संचालन और कार्गो एयरलाइंस का संचालन करती है.

प्रमुख इमारतें नहीं होंगी बिक्री प्रक्रिया का हिस्सा

बेशक सरकार एयर इंडिया की शत-प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की कोशिश में है, लेकिन वह मुंबई के नरीमन प्वाइंट स्थित एयर इंडिया बिल्डिंग और मध्य दिल्ली स्थित मुख्यालय भवन जैसी प्रमुख इमारतें, एयर इंडिया की कलाकृतियां, पेंटिंग को बिक्री प्रक्रिया से अलग रख रही है. इसके अलावा सेंटौर ब्रांड के तहत एयर इंडिया के स्वामित्व वाले होटल, एयर इंडिया इंजीनियरिंग सर्विसेज लिमिटेड (एयर इंडिया की 100 प्रतिशत स्वामित्व वाली जमीनी संचालन कंपनी) और एलायंस एयर (एयर इंडिया के तहत क्षेत्रीय एयरलाइन) की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी को बिक्री से पहले एयर इंडिया लिमिटेड से अलग कर दिया जायेगा.

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कर्ज के बोझ में कटौती

पिछली बार जब एयर इंडिया की बिक्री के लिए बोली लगायी गयी थी, तो उसके संभावित खरीदार को एयर इंडिया के साथ उसके 33,392 करोड़ रुपये के कर्ज का बोझ भी उठाना था. लेकिन, इस बार संभावित खरीदार के लिए कर्ज की राशि काफी कम कर दी गयी है. इस बार खरीदार को एयर इंडिया खरीदने के साथ उसके 23,286 करोड़ रुपये के कर्ज को ही चुकाना होगा. वर्तमान में एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस पर संयुक्त रूप से 60,074 करोड़ रुपये का कर्ज है.

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विनिवेश का विकल्प कितना सही

इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) को उम्मीद है कि विनिवेश से एयर इंडिया को बचाया जा सकता है. एयर इंडिया समेत 290 एयरलाइंस आईएटीए की सदस्य हैं. एयर इंडिया की रणनीतिक विनिवेश की कोशिश में लगी केंद्र सरकार ने कर्ज में डूबी एयरलाइंस की 100 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की घोषणा की है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार साल 2019 में भारत में एयर पैसेंजर ट्रैफिक लगभग चार प्रतिशत बढ़कर 14.41 करोड़ हो गया. मौजूदा विनिवेश योजना में एयर इंडिया एक्सप्रेस की 100 प्रतिशत की हिस्सेदारी बेचने के साथ संयुक्त उपक्रम एयर इंडिया एसएटीएस एयरपोर्ट सर्विसेज (एआईएसएटीएस) की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी को भी शामिल किया गया है. तीन उपक्रमों को बेचने के साथ नये निवेशक को प्रबंध नियंत्रण सौंपा जायेगा.

भारतीय विमानन क्षेत्र पर गंभीर संकट

बीते साल भारतीय विमानन क्षेत्र से कई अप्रिय खबरें आयीं. देश की एक मात्र निजी क्षेत्र की फुल-सर्विस कैरियर जेट एयरवेज बंद हो गयी. साल के आखिर में एयर इंडिया के बढ़ते घाटे को रोकने के लिए निजीकरण की कवायद तेजी हुई. देश के कुछ प्रमुख हवाई अड्डों के रनवे पर कुछ अवांछित घटनाएं हुई. इसके अलावा सुरक्षा मानकों पर भी चिंता जतायी गयी. एविशन कंसल्टेंसी फर्म सीएपीए की दिसंबर रिपोर्ट में भारतीय एविएशन कंपनियों को साल 2019-20 में 60 करोड़ डॉलर घाटे का अनुमान लगाया गया, जबकि जून, 2019 की इसी रिपोर्ट में मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान मुनाफे का दावा किया गया था. इससे पहले सितंबर तिमाही में स्पाइसजेट और इंडिगो को क्रमश: 462.6 करोड़ और 1,062 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. कंसल्टेंसी फर्म नेे पूर्व के अनुमान में बदलाव करते हुए एयर इंडिया को 50 करोड़ डॉलर के घाटे के अनुमान लगाया था.

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कैसे बढ़ता गया संकट

प्रबंधन की कमजोरी और बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा की वजह से सरकारी उड़ान सेवाओं पर संकट की आशंका पहले से थी. वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने इसके विनिवेश के लिए प्रयास किया था. मनमोहन सरकार में निवेश व कर्ज मुहैया कराने के साथ सुधार के उपाय भी कारगर नहीं हुए. नयी सदी के पहले दशक के मध्य से एयर इंडिया की मुश्किलें लगातार बढ़ती गयीं.

मार्च, 2007ः एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस को क्रमशः 541.30 और 230.97 करोड़ का घाटा.

अगस्त 23, 2007ः सरकार ने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय कर नेशनल एविएशन कंपनी ऑफ इंडिया के नाम से नयी कंपनी की घोषणा की.

मार्च, 2008ः नयी कंपनी का घाटा 2226 करोड़ पहुंचा.

जून, 2009ः नगदी की कमी के कारण जून के वेतन में 15 दिन देरी की विज्ञप्ति जारी. एयर इंडिया प्रमुख अरविंद जाधव ने कर्मचारियों को पत्र लिख कर कहा कि सच का सामना करने का समय आ गया है.

जुलाई, 2009ः तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने बताया कि एयर इंडिया का कुल घाटा 7200 करोड़ हो गया है. इसके साथ उधारी बढ़कर 15241 करोड़ हो गयी.

अगस्त, 2009ः जाधव ने तीन साल में बेहतरी की योजना घोषित की. छंटनी और अन्य उपायों को एक के अलावा अन्य 11 कर्मचारी संगठनों ने खारिज करते हुए भूख हड़ताल शुरू कर दी. विमान चालकों ने भी आंदोलन छेड़ दिया.

अक्टूबर, 2009ः सचिवों की समिति ने कंपनी को खर्च कम करने का प्रस्ताव पेश करने को कहा, ताकि पूंजी डालने या आसान कर्ज को तार्किक आधार मिल सके.

12 नवंबर, 2009ः मंत्रियों के समूह ने कहा कि मासिक समीक्षा के बाद मदद मुहैया करायी जायेगी और प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जायेगा.

12 जनवरी, 2010ः बजट से पहले धन मिलने की संभावना समाप्त. विमानन विशेषज्ञों ने एयर इंडिया को अधिक स्वायत्तता देने की सलाह दी. सरकारी तेल कंपनियों ने उधार पर ईंधन देना बंद करने की धमकी दी.

मार्च, 2010ः एयर इंडिया ने 27 बोइंग ड्रीमलाइनर जहाज खरीदने का ऑर्डर दिया. सरकार ने संसद को बताया कि कंपनी का घाटा उस वित्त वर्ष में 5400 करोड़ रुपये हो सकता है. सरकार की ओर से फरवरी व मार्च में कुल 800 करोड़ रुपये उपलब्ध कराये गये.

मई, 2010ः 73 उड़ानों के बाधित होने से 12 करोड़ का घाटा. लगभग 16 बैंकों ने 475 मिलियन डॉलर मूल्य के नये विमानों की खरीद के लिए फिर से धन देने की इच्छा जतायी.

जून, 2010ः कंपनी ने संकट से मुक्ति पाने के लिए नयी रणनीति पर काम करना शुरू किया. वर्ष 2007 से 2009 के बीच कुल घाटा 8461.88 करोड़ जा पहुंचा.

2011ः नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने 2006 में करीब 70 हजार करोड़ के 111 जहाजों की खरीद के सरकारी फैसले पर जरूरत के हवाले से सवाल उठाया.

2012ः मनमोहन सरकार ने एयर इंडिया को उबारने के लिए 10 साल की अवधि में 30 हजार करोड़ मुहैया कराने का फैसला किया.

2015-16 और 2016-17ः उपायों की विफलता और ठोस नीतिगत पहल के अभाव में एयर इंडिया की स्थिति लगातार बिगड़ती गयी. इसमें 28 हजार करोड़ की राशि डालने के बावजूद 2015-16 और 2016-17 के दो वित्त वर्षों में कंपनी सिर्फ 403.03 करोड़ रुपये का ऑपरेटिव मुनाफा ही कमा सकी, लेकिन यह शुद्ध मुनाफा नहीं था.

जुलाई, 2017ः कैबिनेट ने एयर इंडिया के विनिवेश की घोषणा करते हुए समय सीमा और प्रक्रिया निर्धारित करने का निर्देश जारी किया. तब भी यह देश की सबसे बड़ी घरेलू और दूरस्थ उड़ान सेवा देनेवाली कंपनी थी, जिसके पास 140 विमान थे तथा एयर इंडिया करीब 41 अंतरराष्ट्रीय और 72 घरेलू शहरों में उड़ान भरती थी.

2017ः केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार और एयर इंडिया व इंडियन एयरलाइंस के प्रबंधनों के विभिन्न विवादित निर्णयों के मामले में तीन मामले दर्ज किये और एक शुरुआती जांच की पहल की. इन फैसलों में फायदेमंद हवाई मार्गों को निजी उड़ान सेवाओं को सौंपे जाने का मामला भी था.

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Avinash Roy

Editor-in-Chief at Samastipur Town Web Portal

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