सुप्रीम कोर्ट बिहार में जातिगत सर्वेक्षण कराए जाने के राज्य सरकार के फैसले को बहाल रखने वाले पटना हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अब 16 अप्रैल से विस्तृत सुनवाई होगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले में विस्तार से सुनवाई की जरूरत है। पीठ ने कहा ‘इस मामले में दाखिल सभी हस्तक्षेप अर्जियों पर भी उसी दिन से सुनवाई होगी।
इससे पहले 2 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से जाति सर्वेक्षण डेटा पब्लिक डोमेन में रखने को कहा था। और जाति सर्वेक्षण को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं को किसी तरह की अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया था।
आपको बता दें बीते साल 2 अक्टूबर, 2023 को नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बिहार की महागठबंधन की सरकार ने जाति सर्वेक्षण के निष्कर्ष जारी किए। तब विपक्षी नेताओं ने जाति सर्वेक्षण पर कई तरह के सवाल उठाए थे। और फिर जब जाति सर्वेक्षण के आंकड़े जारी किए थे। तब उसपर भी विपक्षी दलों ने कई तरह के सवाल खड़े किए थे। उस वक्त नीतीश कुमार जदयू-राजद-कांग्रेस गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। बीते महीने नीतीश कुमार ने पाला बदलकर बीजेपी के साथ एनडीए की सरकार बनाई है।
जाति सर्वेक्षण के मुताबिर बिहार में ओबीसी और ईबीसी की आबादी का 63 प्रतिशत हिस्सा हैं। राज्य की कुल जनसंख्या 13.07 करोड़ से कुछ अधिक थी, जिसमें से अत्यंत पिछड़ा वर्ग (36 प्रतिशत) सबसे बड़ा सामाजिक वर्ग था, इसके बाद 27.13 प्रतिशत के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग था।
सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि यादव, एक ओबीसी समूह जनसंख्या के मामले में सबसे बड़ी जाति है, जो कुल का 14.27 प्रतिशत है। कुल आबादी में दलितों की हिस्सेदारी 19.65 प्रतिशत है, जिसमें अनुसूचित जनजाति के लगभग 22 लाख (1.68 प्रतिशत) लोग भी रहते हैं।
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