जैविक युद्ध : 21वीं सदी में एक उभरता हुआ खतरा, पढ़ें यह रिपोर्ट…

लेख : बिपुल भारद्वाज 

आज दुनिया जब 21वीं सदी के प्रारंभ में है वहीं दूसरी तरफ इस सदी के लिए दुनिया के विभिन्न कोनों में “जैविक दुश्मन” तैयार हो रहे हैं। जी हां सुनने में थोड़ा अजीब है, परंतु हम इससे अनजान भी नहीं हैं “जैविक युद्ध को” आधुनिक सदी के युद्ध के रूप में मान्यता प्राप्त है। हम शायद जैविक युद्ध शब्द से भली भांति परिचित ना हो परंतु हमारे पूर्वजों ने इसके गंभीर परिणाम देखे हैं। वहीं परिणाम स्वरूप अपनों और प्रिय जनों को खोया है।

वहीं दूसरी ओर पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रमों को वैज्ञानिक किए आधार से परखा जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि हम भी जैविक युद्ध लड़ रहे हैं। जैविक युद्ध का इतिहास भी पहाड़ जैसा पुराना है अगर इसके अतीत को देखें तो बीते सदी में हमने प्लेग, हैजा, चेचक जैसे नामों से बखूबी अवगत है, और इसके गंभीर परिणाम भी देखे हैं, लेकिन अभी भी हम जैविक खतरों से अनजान हैं। इसे “रोगाणु युद्ध” के रूप में भी जानते हैं। वैज्ञानिक शोध से यह पता चला है, कि जैविक हथियारों में विषाक्त पदार्थों या संक्रामक तत्वों का उपयोग शामिल होता है। जो मूल रुप से जैविक होते हैं जिसमें बैक्टीरिया वायरस या कवक हो सकते हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों के घटनाक्रमों को देखकर अब हमें यह समझ आ गया होगा कि जैविक युद्ध या जैविक खतरा क्या होता है।

चिंताजनक विषयम :

दुनिया के कुछ प्रमुख शोध संस्थानों ने अपने वक्तव्य में यह माना है कि आने वाले समय में जैविक हथियार ही युद्ध के केंद्र बिंदु हो सकते हैं। शत्रु देश या आतंकी समूह द्वारा परमाणु हमले की आड़ में जैविक हमले कर सकते हैं एवं इनकी निरंतर संभावना बनी रहती है जिसके कुछ मुख्य कारण भी हैं, इसका कम लागत से तैयार होना, आसान और गंभीर मारक क्षमता होना भी बताया गया है। इसे हम आसान शब्दों में “गरीबों का परमाणु बम” भी कह सकते हैं।

वस्तुतः अगर विश्व संगठनों द्वारा इसकी रोकथाम के लिए कठोर कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब हमारी आने वाली पीढ़ियां हिरोशिमा और नागासाकी जैसे “जैविक युद्ध” के पीड़ितों में गिने जाए।

समस्तीपुर Town जैविक युद्ध : 21वीं सदी में एक उभरता हुआ खतरा, पढ़ें यह रिपोर्ट… January 14, 2022

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Avinash Roy

Editor-in-Chief at Samastipur Town Web Portal