” आशाएँ ” — आसमान में चांद तारो को निहारकर… [संजना गुप्ता की कलम से]

संजना गुप्ता :

आसमान में चांद तारो को निहारकर
सोचती हूं कहूँ कुछ मुँह बनाकर
चुराकर सबसे और चोरी ही चोरी
क्यों खेलते हो मुझसे आंख मिचौली

कभी देखकर कहते हो, समझदार बहुत हो तुम
फिर कुछ दिनों बाद फेर कर मुह कहते हो समझदारी की गलतफहमी है तुम में

तुम्हारी रंगत में मुझे अपने सपने दिखते है
इसलिए निहारती रहती हूं तुम्हे
चुराकर सबसे और चोरी ही चोरी
पर क्यों खेलते हो मुझसे आंखमिचौली।

लानत है मुझपर ग़र कुछ कर न सकी तो
टूटते हुए हौसले बिखरकर सवाल कर रहे है
नींद की जगह बेचैनी की काबिज है
ग़र उन सवालो का जवाब मैं न दे सकी तो

" आशाएँ " -- आसमान में चांद तारो को निहारकर... [संजना गुप्ता की कलम से] समस्तीपुर Town

पिछले हर रातो में नींद का इंतज़ार होता था
लेकिन अब सोने का मन नही होता क्योंकि
डर लगता है कि वो फिर आकर सवाल करेगा
ग़र उन सवालो का जवाब मै न दे सकी तो

ये जो मेरे मन अंदर का आदमी है
बहुत बेरहम है ऐसे सवाल करता है
जैसे फ़र्क नही पड़ता इसे मेरे बेचैन होने से
सोचता नही है,
ग़र मै इसके सवालों का जवाब न दे सकी तो

गलती इसकी नही है, मैंने ही उम्मीदे बढ़ाई
अपनी कमियों को खुद से ही छुपाई
छुपन छुपाई का खेल नही है ये की
ग़र ढूंढ न पाए तो कोई ग़म नही

ये ज़िन्दगी है ढूंढ कर झकझोर कर
सवालों का जवाब फिर से मांगेगी
तब कोशिश करूँगी दोबारा ये न कहूं
ग़र इन सवालो का जवाब दे न सकी तो ।।।

कवयित्री : संजना गुप्ता की कलम से...🖋️

रामपुर दुधपुरा, समस्तीपुर (बिहार) 

Avinash Roy

Editor-in-Chief at Samastipur Town Web Portal

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