मुझे सिखाया जाता था, “मुसलमानों से मत उलझना, काटकर फेंक देंगे”

मेरा जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ और इसी वजह से बचपन से ही पूजा-पाठ देखने का अवसर मिलता रहा। हालांकि मेरे घर में इन सब चीजों को ज़्यादा मान्यता नहीं दी जाती है। स्कूल के शुरूआती दिनों में ना तो मुझे यह पता था कि मुस्लिम क्या हैं और ना ही यह कि एक ब्राह्मण ‘मुस्लिम’ से दूरी बना कर क्यों रखता हैं।

स्कूल में सभी के साथ खाना-पीना, खेलना और साथ में घूमना भी होता था लेकिन यह चीजें स्कूल तक ही सिमट कर रह जाती थी। घर आकर कभी इस बात का ज़िक्र करना बहुत बड़ा रिस्क था। लोगों से सुनता था कि मुस्लिमों से दूर रहो, वे गाय खाते हैं। हैरानी इस बात की है कि मुझे उनके शरीर में सटने तक नहीं दिया जाता था। उनके शरीर में सटने से हम ब्राह्मण छुआ जाते हैं और हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाता है, इसी तरह की और भी कई बातें हमें बताई गई।

घर के बगल के दादा और चाचा जी का कहना था कि उनसे गलती से भी झगड़ा मत करना, काट कर फेंक देंगे। “काट कर फेंक देते हैं” यह शब्द हम हिन्दुओं में उतनी ही बार ज़िक्र किया जाता है जितनी बार मुस्लिम शब्द का प्रयोग हो। मतलब, मुस्लिमों के लिए इंसान को काटना उतना ही आसान है जितना कि सब्ज़ी को काटना।

ऐसी ही तमाम तरह की बातें हम गांव में सुनते थे लेकिन मुस्लिम से संबंधित सामान्य बच्चों के दिमाग में आने वाले किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया जाता था।

ब्राह्मण मांस नहीं खातें

अब इस बात में बिल्कुल भी सच्चाई नहीं रही। मांस मतलब मुस्लिम, हमें यही बताया जाता रहा है। घर में अंडा भी आता तो छिपा कर कि कहीं कोई देख ना ले। अंडा, चिकन और मटन लगभग सभी घरों में बनते थे। मतलब, हम ब्राह्मण तो हैं लेकिन घर के उस कोने से बाहर जहां मांस को पकाया जाता है।

घर में नॉनवेज के लिए अलग चूल्हा और बर्तन भी रखा जाता है। रविवार, मंगलवार और गुरूवार को मांस खाना पाप है बाकी हम किसी भी दिन खा सकते हैं। इसका मतलब है कि हम सप्ताह के इन तीनों दिनों को छोड़कर चार दिन मुस्लिम हुआ करते हैं।

गांव से निकल कर जब शहर के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में आया तब पता चला कि इस भाग-दौर में किसी को इन सब बातों से कोई मतलब ही नहीं है। मेरे कई मुस्लिम दोस्त हैं, ऑफिस में भी कई मुस्लिम हैं जो साथ काम करते हैं। यहां फिर से उनके साथ खाना-पीना, उठना-बैठना शुरू हुआ।

इस बार मुस्लिमों के लिए मेरी सोच बदल चुकी है क्योंकि मैंने उन्हें करीब से जानने की कोशिश की। मैं जितनी बार मस्जिद जाता हूं शायद ही उतनी बार मंदिर जाता होऊंगा। इसका सबसे बड़ा कारण है हमारा समाज। बचपन में जो भी सुना वह झूठ और फरेब निकला। समाज ने मेरे दिमाग में ऐसा कचरा भरा जो आसानी से नहीं निकले वाला था।

इसी कारण उनकी सच कही बातों में भी मुझे फरेब नज़र आता है। अब मुझे हंसी आती है उन पर, वे कहते हैं कि ‘मुस्लिम’ हिन्दुओं के ठीक उल्टा चलते हैं। जैसे- हिन्दू पूरब की दिशा में पूजा करते हैं तो मुस्लिम पश्चिम की तरफ घूम कर नमाज़ पढ़ते हैं। उन्होंने इसके पीछे के कारण को जानना उचित नहीं समझा।

इतना ही नहीं सबने अपना-अपना रंग भी बांट कर रखा है। हिन्दुओं का भगवा और मुस्लिमों का हरा। रंग का खेल यहीं खत्म नहीं होता, हम हिन्दुओं ने तो सप्ताह के सभी दिनों के लिए अलग-अलग रंग बांट कर रखा है। जैसे- शनिवार को काला, मंगलवार को लाल, गुरुवार को पीला और बाकी दिनों के लिए भी अलग रंग हैं।

मैं ब्राह्मण होते हुए भी मुस्लिम हूं

यह उनका कहना है जिस समाज में मैं रहता हूं क्योंकि मैं जनेऊ पहनना पसंद नहीं करता। किसी के मरने पर अपने बाल नहीं कटवाता और पूजा-पाठ में विश्वास नहीं रखता। इसलिए मैं हिन्दू के नाम पर मुसलमान हूं। कई बार तो मुझे यह भी सुनने को मिला है कि यदि कोई हिन्दू लड़की मुस्लिम लड़के से शादी कर ले तब उसे ज़िन्दगी भर बच्चे ही पैदा करने पड़ते हैं और गाय का मांस भी पकाना पड़ता है।

“छि छि छि उसने मुस्लिम लड़के से शादी कर ली। अब ना जाने उसका क्या होगा, देखना किसी दिन उसे काट कर फेंक देगा या कहीं बेच देगा।” यही बातें होती हैं जब कुछ लोग इकट्ठे बैठकर गप्पे लड़ा रहे हों। तीन साल पहले की बात है, हिन्दुओं द्वारा बनाए हुए एक दल में मैं यह जानने के लिए पहुंचा कि आखिर वहां क्या बातचीत होती है क्योंकि मुझे मेरे ही किसी दोस्त ने बताया था कि वहां मुस्लिमों की पोल खोली जाती है।

खैर, मैं उस दल का नाम नहीं लूंगा लेकिन जब मैं वहां गया तब हैरान रह गया। वहां कुछ धर्म के ठेकेदार बैठे थे, जिनका काम था लोगों में द्वेष भरना और दूसरे धर्म के लोगों के प्रति उन्माद फैलाना। बैठक में बातचीत शुरू होते ही सबसे पहले मुझे लगा कि वहां बोली लगाई जा रही हो।

किस बात की बोली आप भी जानिए

“अगर कोई हिन्दू लड़का किसी ‘मुस्लिम लड़की’ को अपने प्रेम जाल में फंसाकर या झांसा देकर उससे शादी कर लेता है तब उसे इनाम मिलेगा।” इनाम में कई लोग तो 50 हज़ार रुपये देने की बात कर रहे थे, 10-20 हज़ार देने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक थी। साथ ही उनके रहने, खाने, पीने व उनको सुरक्षा मुहैया कराने पर भी बात हो रही थी।

मैं यह सब देखकर बिल्कुल हैरान था लेकिन मेरी हैरानी यहीं खत्म नहीं हुई। आगे सवाल-जवाब का सत्र भी आया जिसमें लोग अपने मन मुताबिक मुस्लिमों से सम्बंधित कोई भी प्रश्न पूछ सकते थे। बैठक में बच्चे से लेकर बूढ़े तक आए थे। लगभग 16 साल के लड़के ने पूछा कि मुस्लिम लड़कियां बुर्का क्यों पहनती हैं? वही एक ने पूछा कि मुस्लिमों में खतना का रिवाज़ क्यों और कैसे आया?

जवाब देने वाले कोई और नहीं हमारे ही समाज के वरिष्ठ लोग थे। वे प्रश्नों के जो जवाब देते उसका ना तो कोई आधार होता और ना ही कोई तथ्य। यह सब देखकर ज़हन में कई तरह के सवाल उठते हैं।

अमन झा की कलम से... 📝

नोट: तस्वीर प्रतीकात्मक है, फोटो साभार: Flickr

Avinash Roy

Chief in Editor at Samastipur Town Web Portal

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