पहले की तरह अब नहीं गूंजते सामा-चकेवा के गीत, आधुनिक दौर में गुम हो रही लोक-संस्कृति

मिथिलांचल में छठ पर्व के समाप्त होते ही घरों में सामा-चकेवा के लोकगीत गूंजने लगते थे। लेकिन, भौतिकवादी-बाजारवादी संस्कृति के वर्तमान बदलते परिवेश में लोगों के जीवन शैली में बदलाव से अब माहौल भी बदलता जा रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा की आधुनिकता के इस दौर में परंपराएं और लोक प्रथाएं दम तोड़ती नजर आ रही है। पहले भैया-दूज के समय से ही गलियों में सामा-चकेवा बेचने वालों की आवाजाही शुरु हो जाया करती थी और छठ के अंतिम दिन यानी की परणा के दिन से ही कार्तिक पूर्णिमा तक प्रत्येक दिन शाम ढ़लते ही घरों की महिलाएं सामा चकेवा के गीत गाते हुए डाला फेरते नजर आती थी।

सिमटती जा रही लोक संस्कृति

कार्तिक पूर्णिमा की रात सामा चकेवा को जोते हुए खेत में विसर्जित किया जाता है जहां चुगला और वृंदावन को पूरी तरह जला दिया जाता है। लेकिन लोक प्रथाओं के प्रति लोगों की उदासीनता का आलम यह है कि वर्तमान समय में सामा चकेवा बनाकर अपना जीवन यापन करने वाले कारिगरों के पास भुखमरी के हालात बन चुके हैं। हालत यह है कि इनमें से कई ने तो अपना पेशा ही बदल लिया है और मिथिलांचल क्षेत्र में लोक आस्था का यह पर्व बीते दिनों की बात बनती जा रही है। शहरी क्षेत्रों से तो यह लगभग गायब ही हो चुका है।

घट रही जानकार महिलाओं की संख्या

वर्तमान समय में यह परंपरा सिमटती जा रही है। शहर की तो छोड़िए गांवों में भी एक्का-दुक्का घर के दरवाजों पर ही दो-चार महिलाएं बैठ कर इस पर्व को मनाते दिखती हैं। आधुनिकता इस कदर समाज में हावी है कि इस तरह के त्योहारों को मनाना पिछड़ापन माना जाने लगा है। सामा चकेवा के पारंपरिक लोक गीत जानने वाले महिलाओं की तादाद घटती ही जा रही है। नई पीढ़ी की कई लड़कियों व महिलाओं को तो सामा चकेवा की कथा और पारंपरिक लोक गीतों की जानकारी भी नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाली पीढ़ी को शायद इसका नाम भी पता नहीं होगा।

भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक

रक्षाबंधन और भैया दूज की तरह सामा चकेवा भी भाई बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक पर्व है। लगातार घटती लोकप्रियता के बावजूद मिथिला के कुछ भागों में अभी भी इसका महत्व कायम है। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ ही उम्रदराज महिलाएं साथ-साथ इसे उल्लास से मनाती है। इस पर्व की खास बात यह है कि जहां बहनें अपने भाई के दीर्घ आयु की कामना करती है, वहीं इसके गीत पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देते हैं। बुरे चरित्र के प्रतीक चुगला को जलाकर सामाजिक संदेश भी देता है यह पर्व।

पुराणों में है सामा की चर्चा

मान्यताओं के अनुसार लोकपर्व सामा-चकेवा पद्म पुराण में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण के पुत्री साम्बवती (सामा) और पुत्र साम्ब के पवित्र प्रेम पर आधारित है। चुड़क नामक एक चुगलबाज ने एक बार श्रीकृष्ण से यह चुगली कर दी कि उनकी पुत्री साम्बवती वृंदावन जाने के क्रम में एक ऋषि के संग प्रेमालाप कर रही थी। क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने अपनी पुत्री और उस ऋषि को शाप देकर मैना बना दिया। साम्बवती के वियोग में उसका पति चक्रवाक (चकेवा) ने भी मैना बन गया। यह सब जानने के बाद साम्बवती के भाई साम्ब ने घोर तपस्या कर श्रीकृष्ण को प्रसन्न किया और अपने बहन और जीजा को शाप से मुक्त कराया। तबसे ही मिथिला में सामा-चकेवा पर्व मनाया जाता है।

सामा-चकेवा के कुछ प्रसिद्ध लोकगीत

* वृंदावन मे आगि लागल कियो नहि मिझाबे हे, हमर बड़का-छोटका भईया मिलकए मिझाउत हे……..।

* गाम कए अधिकारी तोहें बड़का भैया हो, हाथ दस पोखरि खुना दिए, चंपा फुल लगा दिए हे………।

* चाउर, चाउर, चाउर, हमरा भाई कोठी चाउर, छाउर, छाउर, छाउर, चुगला घर में छाउर……।

* चुगला करे चुगली, बिलाइया करै म्याओं, चुगला के जीभ हम नोची-नोची खाउं……..।

* साथ साम चके साम चके अईह हे, जोतला खेत मे बैठिह हे….।

* अयलय कार्तिक मास हो भईया, सामा लेल अवतार, चिठी लय कय जैहें हजमा नैहर हमार……।

Avinash Roy

Editor-in-Chief at Samastipur Town Web Portal