पत्रकारिता के छात्र होने की वजह से बहुत चिंतीत हूँ, कैसे इस बिकाऊ मीडिया में शामिल हो जाऊं?

[अमन झा] :- पत्रकारिता के छात्र होने की वजह से बहुत चिंतीत हूँ। एक छोटे से गांव से निकलकर बड़े विश्वविद्यालय तक पहुंचना मेरे लिए बहुत मुश्किल रहा। मैंने विश्वविद्यालय में दाखिले के बाद से ही सपने संजोने शुरू किया। हमेशा यही सोचता कि “मुझे कोई बड़ा पत्रकार नही बनना बल्कि गांव, कस्बों में रहने वाले लोगों की समस्याओं को सरकार के सामने धर दूंगा, ताकि उनका ध्यान गरीबों, किसानों, मजदूरों की तरफ आकृष्ट हो, पर अब मेरे सपने और मैं दोनों ही टूटने लगे हैं। जब मैंने बड़े-बड़े मीडिया हाउस की असलियत को देखा तो लगने लगा जैसे ये लोकतंत्र का नहीं बल्कि सरकार के स्तम्भ हैं।

साफ-साफ कहूँ तो- “वर्तमान में छोटे से लेकर बड़े मीडिया संस्थान लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय सरकार को संभालने में लगी हुई है”।

किसी भी न्यूज़ चैनल और प्रिंट मीडिया से हमें सूचना मिलना बन्द हो गया है, हम वही देखते हैं जो हमें दिखाया जाता है और वही पढ़ते हैं जो पढ़ाया जाता है।

ग्राउंड रिपोर्ट्स तो शायद ही कभी देखने को मिल जाए। खोजी पत्रकारिता किसे कहते हैं ये तो भूल ही जाना बेहतर होगा। अब रिपोर्टरों की जरूरत ही नहीं रही, टीवी पर आने वाले न्यूज़ चैनल में काम करने वाले रिपोर्टर को नौकरी से हटा दिया गया। रिपोर्टर के बदले एंकरों की संख्या बढ़ने लगी। पूरे दिन सरकार के उपलब्धियों को गिनाया जाता है। सवाल? न बाबा न! ऐसी गलती कौन करे। अरे भई सवाल करियेगा तो सरकार अपने चमचों को बहस करने के लिए भेजेगी ही नहीं और न हीं आपको भारी मुनाफे वाले विज्ञापन देगी। अच्छे अच्छे ग्राफ़िक्स देखकर, न्यूज़ रूम के बदले वॉर रूम देखकर, स्टूडियो में एंकर के हाथ में कलम की जगह बंदूक देखकर आप भी तो खुश हैं। फ्लेम की जगह फ़िल्म प्रायोजित किया जाता है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपने स्तर को इतना नीचे गिरा लिया कि इसे देखने से बेहतर तो यह होगा कि हम इत्मिनान से बैठकर फ़िल्म और कॉमेडी के चैनल्स देख लें।

प्राइम टाइम में जरूरी सूचना, समस्या नहीं दिखाते न ही सरकार से सवाल किये जाते हैं बल्कि राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता और धर्म के ठेकेदारों को बुलाकर बहस करायी जाती है। बहस से समाधान तो नहीं निकलता लेकिन मारपीट के लिए जूते जरूर निकल आते हैं। मृदुभाषी, ये क्या होता है? यहां तो देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता द्वारा एक मौलाना को “कठमुल्ला जी” कहकर संबोधित किया जाता है।

ईमानदारी से बताइये, आपने कितने दिन बहस में अस्पताल, पानी की समस्या, शिक्षा, किसानों की आत्महत्या, महंगाई, बेरोजगारी, महिलाओं की सुरक्षा जैसे विषय पर बहस होते देखा है?

प्राइम टाइम से लेकर सामान्य टाइम तक को राम मंदिर से इतना प्यार, स्नेह और लगाव है कि इसके अलावे कोई और मुद्दे से दिल ही नहीं लगता।

एंकर द्वारा प्रधानमंत्री से तीखे-तीखे सवाल किये जाते हैं। जैसे- आप थकते क्यों नहीं? आप सिर्फ 4 घंटे सोते हैं, दिन में आपको नींद नहीं आती? आप आम कैसे खाते हैं, काट कर या चूस कर? अच्छा तो आपको मूंग की दाल भी पसन्द है और रोटी भी बेल लेते हैं? प्रधानमंत्री इन सवालों से परेशान होकर मुस्कुराने लगते हैं। इक्का दुक्का ऐसे न्यूज़ चैनल बचे हैं जो सरकार से सवाल कर सकती है, अब सवाल का जवाब तो है नहीं इसलिए सरकार ने यह निर्णय लिया कि ऐसे न्यूज़ चैनल्स का बहिष्कार किया जाय।

अब देखिये कुछ ऐसे न्यूज़ चैनल हैं जिसके मालिक ही उसके मुख्य एंकर हैं साथ ही मानसिक रूप से बीमार भी। वे विपक्ष को देखना भी पसन्द नहीं करते, अगर किसी विपक्षी ने सरकार से सवाल कर लिया तो वहीं रखे लोहे की कुर्सी को उस विपक्षी के माथे पर पटक देना चाहते हैं।

कई कारण हैं, जैसे- पहला राज्यसभा के लिए जुगाड़ फिट करना है और दूसरा अपना धंधा भी चलाना है।

अब ऐसे में न तो सवाल बचते हैं न ही मुद्दे। अगर मैं भी इनमें शामिल होना चाहूंगा तो सबसे पहले मुझे अपने ज़मीर को बेचना पड़ेगा। और यदि ज़मीर न बेचूं तो ये लोग वह काम करने नहीं देंगे जो मैं करना चाहता हूँ।

अमन झा की कलम से 🖋️…

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Avinash Roy

Editor-in-Chief at Samastipur Town Web Portal

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