हिंदी प्रेम- व्यवहार एवं सहकार- संस्कार की भाषा हैं: डॉ.गगनदेव

समस्तीपुर/दलसिंहसराय:- आज हिंदी दिवस के अवसर हिंदी के यशस्वी साहित्यकार डॉ. गगनदेव चौधरी सह केदार संत रामाश्रय महाविद्यालय, सरायरंजन के हिंदी प्रवक्ता ने कहा कि वैश्विक स्तर पर हिन्दी सम्मानित भाषा के रूप परिगणित होती हैं। इसके साहित्य इतने मर्म आह्लादक हैं कि इसे पढ़ने के लिए अनेक देशांतर के जिज्ञासु हिंदी सीखने के लिए प्रेरित हुए हैं। ऐसे साहित्यों की पंक्ति में तुलसीकृत “श्री राम चरित्र मानस” एवं देवकीनंदन खत्री रचित ‘चंद्रकांता’ और ‘चंद्रकांता संतति’ खड़ी हैं। विदित हैं तुलसी साहित्य के प्रति आकर्षित होकर डॉ. फादर कामिल बुल्के ने हिंदी सीखी और तुलसी साहित्य के आधिकारिक ज्ञाता के आसन पर विराजमान हुए। इसी प्रकार खत्री जी के तिलस्मी उपन्यासों को पढ़ने के लिए कतिपय विदेशी लोग हिंदी सीखने के लिए विवश हुए।

संस्कृत की कोख से निकली हिंदी का शब्द सामर्थ अंग्रेजी से कई गुना अधिक हैं।वर्ण सामर्थ दूना हैं ही। उन्होंने दुखद आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी अपनी वर्ण सामर्थ, शब्द सामर्थ एवं साहित्य सामर्थ के बल पर विश्व की संपर्क भाषा बनने की ओर अग्रसर हैं। परंतु आजादी के 67 वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद आज तक भारत मे वह पूर्ण राज्य भाषा का स्तर प्राप्त नही कर सकी हैं।

केंद्र एवं राज्य सरकार सूबे में विकास का नारा बुलंद कर रही हैं परंतु उन्हें स्मरण करना चाहिए कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने राष्ट्र एवं राष्ट्रभाषा के विकास के मद्देनजर ही लिखा था-निज उन्नति भाषा अहे, सब उन्नति के मूल। यही विकास का मूलमंत्र हैं इसे नजरअंदाज कर किया गया विकास सर्वथा थोथा होगा।

हिंदी के विकास में अनेक आचार्यो के योगदान एवं एक से एक कवियों की साधना को भुलाया नही जा सकता हैं। विश्व के अनेक देशों में हिंदी पढ़ने बोलने और हिंदी में साहित्य सृजन का कार्य तेजी के साथ चल रहा हैं। डॉ. चौधरी ने कहा कि हिंदी की खासियत हैं कि जो बोलते हैं, वही लिखते हैं। हिंदी का कोई भी वर्ण चुप्पी (साइलेंट)नही साधता हैं। इस रूप में गौरव के साथ कहा जा सकता हैं कि हिंदी प्रेम-अनुराग, व्यवहार एवं संस्कार की भाषा हैं।हिंदी के इस प्रेम अनुराग ,व्यवहार एवं संस्कारो को सभी स्तरों पर व्यापक बनाने के लिए दृढ़संकल्पित होने की आवश्यकता हैं। हिंदी साहित्य की विपुलता के साथ दूसरा पक्ष इसकी प्रयोजनमूलकता भी हैं। अक्सर कार्यालय कर्मी हिंदी में काम करने के वजाय अंग्रेजी में काम करना अधिक सुविधाजनक मानते हैं। उनका मानना हैं कि हिंदी के पास कार्यालय कार्य के लिए उचित शब्द नही हैं। उनका यह कथन सर्वथा निराधार हैं। यर्थात हैं कि उनके मानस में हिंदी के प्रति सम्मान का भाव नही हैं। यदि सम्मान का भाव रहे तो वे हिन्दी के शब्दों की खोज आसानी से कर सकेंगे। इंटरनेट के युग मे बटन दबाने मात्र से ही उचित शब्द स्क्रीन पर दिख जाते हैं। वस्तुतः राष्ट्र और राष्ट्रभाषा के विकास के साथ भारत की भूमंडलीकरण के क्षितिज पर स्थापित करने के लिए आवश्यकता इस बात की हैं कि वे हिन्दी के सर्वथा प्रयोग करे और दूसरे कर्मियों को भी इसके लिये प्रेरित करे।
इस तरह वह दिन दूर नही जब आज की अंग्रेजी का स्थान हिंदी ग्रहण कर लेगी। साथ ही विश्व मे भारत और भारत की हिंदी का झंडा लहरा सकेगा।

समस्तीपुर टाउन संवाददाता रमण कुमार की रिपोर्ट

Avinash Roy

Chief in Editor at Samastipur Town Web Portal

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