“मैं गाँधी मैदान हूँ…” [कविता – नौशाद की कलम से]

मैं गाँधी मैदान हूँ बिहार की शान हूँ बदलाव का प्रतीक हूँ रैलियों का गवाह हूँ हाँ, मैं गाँधी मैदान हूँ ।   मैं गाँधी मैदान हूँ शहर की अजान हूँ युवाओं का मान हूँ नेताओं की पहचान हूँ नए नेता उपजाता मैं हूँ हाँ, मैं गाँधी मैदान हूँ।   मैं गाँधी मैदान हूँ इतिहास का गवाह हूँ पूरे बिहार की आवाज हूँ बेसहारा का सहारा मैं हूँ बेरोजगारों का रोजगार हूँ हाँ, मैं गाँधी मैदान हूँ ।   मैं गाँधी मैदान हूँ तख्तो, ताज भी बदला हूँ कर्पूरी से…

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नारी शोषण की व्यथा सुनाती कविता : “आज का रावण…”

पग-पग रावण मिलते अब तो, कन्याओं को हर रहे हैं, कुकर्म कर्म नित्य कर रहे हैं। कभी भेष साधु का धरकर, मंडप-महल सजाते हैं। मौका पाय हैवान वे बनते, दामन पर दाग लगाते हैं। मीठी-मीठी बातों से अपनी, अबलाओं को छल रहे हैं, कुकर्म कर्म नित्य कर रहे हैं। कभी छुपा रुस्तम बन वे, पीछे से बाण चलाते हैं। उनकी चतुर चौकड़ी में फंस, उन्हीं को व्यथा सुनाते हैं। समय देखकर हरण हैं करते, कलियों को कैसे मसल रहे हैं, कुकर्म कर्म नित्य पग-पग। सब खिलाफत कर नहीं पाते, मन…

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