बिहार की राजनीति में चिराग के लिए क्या स्कोप है? वह अपने पिता की तरह हवा रूख नहीं भांप पाए?

बिहार विधानसभा और विधान परिषद के दरवाजे लोक जनशक्ति पार्टी (चिराग पासवान) के लिए बंद हो चुके हैं। बिहार की राजनीति में दो ही धुरी रह गई है। तीसरे के लिए अब कोई चांस नहीं बचा है। जिसमें एक नीतीश कुमार (बिहार NDA) हैं। दूसरा लालू यादव (RJD+कांग्रेस+लेफ्ट)। लालू यादव (+) विपक्ष में तो नीतीश कुमार (+) सत्ता में। नीतीश कुमार पिछले 15 साल से बिहार की सत्ता पर काबिज हैं। भारतीय जनता पार्टी के साथ भी सत्ता में रहे और राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस के साथ भी। मतलब बिहार की सत्ता की धुरी नीतीश कुमार बने हुए हैं।

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स्वर्गीय रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी की कमान आजकल उनके बेटे चिराग पासवान की हाथों में है। चिराग पासवान को न तो नीतीश कुमार सूट करते हैं और ना ही नीतीश को चिराग। बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान की वजह से जेडीयू को करीब 25-30 सीटों का नुकसान हुआ था। नीतीश कुमार इस चीज को भूले नहीं हैं। वो एलजेपी को बिहार की राजनीति से पूरी तरह आउट करने पर तूले हुए हैं। एलजेपी के इकलौते विधायक राजकुमार सिंह को अपने पाले में कर चुके हैं और एलजेपी की इकलौती एमएलसी नूतन सिंह ने बीजेपी का दामन थाम लिया। मतलब बिहार विधानसभा और विधान परिषद में एलजेपी का खाता बंद हो चुका है। राज्यसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।

लोकसभा में एलजेपी के 6 सांसद हैं, जिसमें पासवान परिवार से ही 3 हैं, एक तो खुद जमुई से चिराग पासवान हैं, दूसरा समस्तीपुर से उनके चचेरे भाई प्रिंस राज और तीसरा हाजीपुर से उनके चाचा पशुपति कुमार पारस शामिल हैं। बाकी तीन सांसद में वैशाली से वीणा देवी हैं जो मुजफ्फरपुर से जेडीयू विधायक दिनेश प्रसाद सिंह की पत्नी हैं।

नवाादा से सांसद चंदन सिंह बाहुबली सूरजभान सिंह के भाई हैं। हाल ही में उन्होंने नीतीश कुमार से मुलाकात की थी। खगड़िया से एलजेपी सांसद महबूब अली कैसर कभी बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे। 2014 में पार्टी छोड़ते वक्त उन्होंने कहा था कि ‘उनको लगता है कि वो कांग्रेस की टिकट पर चुनाव नहीं जीत सकते इसलिए एलजेपी में शामिल हो रहे हैं।’ मतलब की जहां जीत पक्की, वहां महबूब अली कैसर जा सकते हैं।

फाईल फोटो : महबूब अली कैसर

लोक जनशक्ति पार्टी की दलित जातियों की राजनीति करने का दावा करती है। मगर उसके सांसद और पार्टी नेताओं में दलितों का प्रतिनिधित्व काफी कम रहता है। दलित के नााम पर ज्यादातर सांसद-विधायक पासवान परिवार से ही रहते हैं। ये रामबिलास पासवान के जमाने से ही होते आ रहा है। चिराग पासवान उस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। हालही में एलजेपी के 208 नेता-कार्यकर्ता जेडीयू में शामिल हो गए। इसमें कई महासचिव और जिलाध्यक्ष भी थे।

2009 चुनाव से सीख थे रामविलास, 2020 से क्या सीखे चिराग?

2009 लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान ने लालू यादव के साथ समझौता कर चुनाव लड़ा था। तब उनको अपने परंपरागत सीट हाजीपुर से भी हार का मुंह देखना पड़ा था। 2010 बिहार विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान की पार्टी से 3 विधायक जीत पाए। दो-दो चुनाव हार चुके रामविलास पासवान हवा का रूख भांप चुके थे। उनको लग गया कि चुनावी गुणा-गणित के हिसाब से सही जगह नहीं हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से समझौता किया। नरेंद्र मोदी की लहर में एलजेपी के 6 उम्मीदवार सांसद बन गए। 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होकर आरजेडी के साथ चुनाव लड़ा। यहां पर रामविलास पासवान बीजेपी के साथ थे मगर सिर्फ 2 उम्मीदवार ही जीत पाए। बाद में नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ आ गए और रामविलास पासवान को राज्यसभा भेज दिए।

2019 लोकसभा चुनाव में एलजेपी ने बीजेपी-जेडीयू के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और उसने 6 सीटों पर कामयाबी पाई। बिहार विधानसभा चुनाव से करीब सालभर पहले रामविलास पासवान ने 5 नवंबर 2019 को पार्टी की कमान चिराग पासवान के हाथों में सौंप दी। बिहार चुनाव से पहले उनका निधन भी हो गया। दो-दो लोकसभा चुनाव से उत्साहित नौजवान चिराग पासवान ग्राउंड की हकीकत नहीं पहचान पाए। तमाम मान-मनौव्वल के बाद भी 2020 बिहार विधानसभा चुनाव के लिए चिराग पासवान एनडीए से समझौता नहीं कर पाए। चिराग ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। अपनी सभाओं में वो नीतीश कुमार को लेकर काफी आक्रामक अंदाज दिखाया। पीएम मोदी के प्रति नरम रहे।

अपने पिता की तरह हवा रूख नहीं भांप पाए चिराग?

रिजल्ट आया तो चुनावी राजनीति में चिराग पासवान मात खा चके थे। उनकी पहचान वोटकटवा के तौर बन चुकी थी। जो चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि चुनाव हरवाने के लिए मैदान में उतरे थे। जेडीयू को 25-30 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। पार्टी बैठक में जेडीयू के हारे हुए उम्मीदवारों ने नीतीश कुमार से कहा कि वो एलजेपी की वजह से चुनाव हारे हैं। नीतीश कुमार इसे अब तक भुला नहीं पाए हैं। माना जा रहा है कि चिराग की केंद्रीय कैबिनेट में एंट्री पर नीतीश कुमार ने ही वीटो लगा दिया है।

बिहार में लगातार तीन विधानसभा चुनाव में हार की वजह से एलजेपी की राजनीति ‘सामने वाले’ पर निर्भर करती है। अगर सामने वाला मजबूत है तो परफॉर्मेंस अच्छा रहेगा। लोकसभा चुनाव के नतीजे यही साबित करते हैं। मतलब लोक जनशक्ति पार्टी के लिए बिहार में अकेले चुनाव जीतना बूते की बात नहीं रह गई है। जबतक उसका किसी न किसी बड़े दल से समझौता नहीं हो जाए। चिराग पासवान के पास अभी लोकसभा के लिए साढ़े तीन साल से ज्यादा और विधानसभा के लिए साढ़े 4 साल से ज्यादा का वक्त है। वो चाहें तो बेहतर तैयारी या समझौता कर सकते हैं।

 

उपेंद्र कुशवाहा और पप्पू यादव से सीख सकते हैं चिराग

चिराग पासवान नौजवान हैं 2019 से पार्टी संभाल रहे हैं। मगर बिहार की राजनीति में उपेंद्र कुशवाहा और पप्पू यादव के भी सियासी करियर से बहुत कुछ सीख सकते हैं। एक समय था जब नीतीश कुमार को उपेंद्र कुशवाहा बड़ा भाई कहा करते थे। एक समय वो भी आया जब उपेंद्र कुशवाहा के सामान को घर खाली कराते वक्त रोड पर फेंक दिया गया। तब नीतीश कुमार बीजेपी से अलग हो चुके थे। उपेंद्र कुशवाहा 2014 में भारतीय जनता पार्टी से समझौता कर लिया। फिर उनकी नाव चल निकली। केंद्र में मंत्री भी बन गए। मगर फिर नीतीश कुमार ने बीजेपी से समझौता कर लिया। अब उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में अनकॉम्फरटेबल हो गए। उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव आरजेडी के साथ मिलकर लड़ा। कामयाबी नहीं मिली। 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने अलग राह पकड़ ली। कोई कामयाबी नहीं मिली। अनुभवी उपेंद्र कुशवाहा समझदार निकले और दुश्मनी भूलकर नीतीश कुमार से समझौता कर लिया।

जन अधिकार पार्टी के सुप्रीमो पप्पू यादव अक्सर मीडिया में छाए रहते हैं। उनके कामों की चर्चा भी होती है। पप्पू यादव कई बार सांसद रहे। उनकी पत्नी रंजीत रंजन भी सांसद रहीं। मगर बदले चुनावी राजनीति में फिट नहीं हो पा रहे हैं। 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में कोई कामयाबी नहीं मिली। चुनावी राजनीति के लिहाज से अनफिट हो गए।

Avinash Roy

Editor-in-Chief at Samastipur Town Web Portal